खामोश हूं मैं, मगर भीतर एक शोर है आँखें मीचे, खोज रही हूं खुद को इन घुप अंधेरों में, ये तन्हाई, ये ज़ख्म ये दर्द, ये अश्क सबकी अब आदत सी है ।