दिल नाजुक
मैं क्यूं भीगूं बरसात में जब, तुम बिजली सी कड़कती हो। मैं मरुं तेरी जुल्फों पर और, तुम किसी की बाहों पर तरसती हो। मैं लोयल बन्दा तेरी जान का, तुम हवशी आत्मा मोह में तड़फती हो। मैं सोचूं सपना तेरे साथ का, तुम मुझसे तलाक ले चुकी हो। तू जाने मैं हूं दिल नाजुक, फिर भी दिल पर वार करती हो। मर क्यों न गया किसी छांह में, जब धूप-सी तेरे बिन ज़िन्दगी हो। मेरे तन-धन से तर्पण न तन तेरा, तो जहर से प्यास बुझाती हो।
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