ख़ामोशी की किताब
तुमसे कहूँ कैसे मैं, मेरे दिल में क्या बस्ता है, शब्दों की दुनिया छोटी पड़ती है, मगर एक एहसास ज़िंदा रहता है। मेरी आँखों की गहराई में झाँको, शायद पूरी दास्ताँ मिल जाएगी, लफ्ज़ों से आगे बढ़कर देखो, ख़ामोशी भी कभी-कभी समज आएगी। मेरी मुस्कान के पीछे हा धूप है, पर थोड़ी-सी छाँव भी छुपी है, तुम समझ सको तो अच्छा, मुस्कान के भीतर एक पूरी ज़िंदगी बनी है। छू लो मेरी बातों को दिल से, मत सिर्फ़ कानों से सुनना, प्यार आवाज़ नहीं करता, बस एहसासों में मुझे चुनना। लिखूँ मैं क्या, जब तुम पढ़ सको, आँखों की नमी और हँसी की वजह, प्यार बोलता नहीं हमेशा, कभी चुप रहकर भी जीता है सदा। अगर पढ़ सको मेरी खामोशी, तो कुछ और कहने की जरूरत क्या, तुम समझ सको तो रिश्ता गहरा, वरना शब्द भी बेवजह, प्यार भी व्यर्थ क्या।
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