ख़ता जो इश्क़ से बढ़कर हो
अगर अपने हक़ के लिए लड़ना ख़ता है, तो ये ख़ता हर बार करेंगे हम। झुके नहीं जो आँधियों से कभी, वो दरख़्त बनकर खड़े रहेंगे हम। अगर इंसाफ़ माँगना गुनाह है, तो ये गुनाह भी कबूल है। जो सिर झुके ज़ुल्म के आगे, वो ज़िंदगी ही फ़िज़ूल है। हर बार तोड़े, हर बार जोड़े, इतिहास में नाम लिखाएंगे हम। अगर हक़ की राह में कांटे हैं, तो नंगे पाँव भी आएंगे हम। ये आग ज़माना जला देगी, हर जुल्म की नींव हिला देगी। जो हक़ दबा था सदियों से, अब दहाड़ बनकर गूंजेगी। Abhyuday
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