दोहा
यह जीवन उपहार। करें कर्म शुभ सर्वदा, करना जन उपकार। मानव तन ये श्रेष्ठ है, यह जीवन उपहार।। मानव जीवन में रहे, श्रेष्ठ सदा संस्कार। अपने उत्तम कर्म से,गुण का करो प्रसार।।* बैर-भाव को त्याग कर, मानो सबको एक। बाँटो जग में प्रेम रस, बनकर रहना नेक।। यह जीवन उपहार जो, जन्म लिए नर गेह। दुष्कर तप के बाद ही, मिली मनुज की देह।। ईश भजन नित कीजिए, जो दे सबको प्राण। उनका यह आदेश है, करना जन कल्याण।। नरेन्द्र सिंह, 24.04.2025
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