प्राग का फ़रिश्ता
अजनबी शहर की राहों में, मैं अकेली, डरी, सहमी सी थी। न जेब में सिक्के, न उम्मीद कोई, बस घबराहट हर सांस में बसी थी। टिकट पर मुहर का नाम न था, पुलिस की आँखों में इल्ज़ाम था। काँपते लफ़्ज़, थमी हुई जुबान, बस खो गई थी हिम्मत की पहचान। तभी तू आया, एक रोशनी बनकर, जैसे अंधेरे में कोई किरन उतरकर। बिना सवाल, बिना शर्त, बस तेरा साथ था मेरी सबसे बड़ी क़िस्मत। तेरी आँखों में था अपनापन, तेरी मदद में था एक पावनपन। पर मैं तेरा नाम भी न पूछ पाई, बस तेरा चेहरा दिल में बसा लाई। आज भी तेरी यादें हवा संग चलती हैं, तेरी मेहरबानी दुआओं में पलती हैं। काश फिर कभी तुझसे मुलाकात हो, किसी मोड़ पर, किसी बात पर, वही मुस्कान, वही फरिश्ता साथ हो।
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