इस बार का तुमसे अपना इश्क..
तुमसे मिलना हो अब शायद किसी और जनम, इस बार का तुमसे अपना इश्क अधूरा ही सही, तुम हो शायद अब किसी और का मुकद्दर, किस्मत में अपना साथ कभी था ही नहीं। घुट-घुट के दम तोड़ती अपनी ख्वाइशें, इस पर भी तुम्हे पाने की नाकाम कोशिशें, सुख गए अब किताबों में गुलाबी पन्ने, बंजर हो गए अब सभी सावनी सपने, इन सब का आना हो अब शायद किसी और जनम इस बार का तुमसे अपना इश्क अधूरा ही सही.. सजदा -ए -इश्क फिर कभी हुआ ही नहीं, बेअसर ही रह गई पढ़ी गईं सब आयतें, ऐसे भी क्या गुनाह हो गए थे हमसे, जो खत्म ही ना हो पाईं शिकायतें, इस बात का मलाल तो रहेगा, जीवन भर ये सवाल तो रहेगा, मिल कर भी फिर बिछड़ना ये नसीब क्यों है? महंगे लिबासों में भी हम इतने गरीब क्यों हैं? इन सबका हल निकलेगा अब शायद किसी और जनम इस बार का तुमसे अपना इश्क अधूरा ही सही... था मैं महंगा बहुत फिर भी न जाने क्यों मुफ्त में बिका था? सभी अपनी- अपनी मंजिल पर थे न जाने किसलिए रुका था? एक स्याही से किताब होने की उम्मीद लगाई थी, ये भरम था या फिर यूं ही किस्मत आजमाई थी, हमें लगा की तुम हर अंधेरे को चीरकर आए थे, मगर तुम सूरज की आड़ में जुगनू बनकर आए थे, एक - एक कर टूट गए अब सारे भरम, उम्मीद कोई बाकी नहीं अब इस जनम, वो चाहतें जो मेरे इंतजार में है, गुलदस्ता लिए कतार में है, अब उनके लिए ही चलेंगे हर कदम। तुमसे मिलना हो अब शायद किसी और जनम, इस बार का तुमसे अपना इश्क अधूरा ही सही...
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