पता नहीं क्यों?
पता नही क्यों? मुझे हमेशा ऐसा अहसास होता है, लोगो के साथ होकर भी अकेला महसूस होता है, लोगो की बातो से दिल टूट सा जाता है, लोगो के बीच में रहकर भी मायूस होजाती हूं मैं, कभी कभी लोगो से टूट जाती हूं मैं। पता नहीं क्यों ? मुझे लगता है की मैं सबकी तरह नहीं हूं, मैं लोगो की बातो से अक्सर बिखर जाती हूं, वो उनकी मजाक भरी बाते मेरे दिल में चुभ जाती है, कभी कभी मैं उनसे भी रूठ जाती हूं, मैं उनकी बातो से टूट जाती हूं। पता नहीं क्यों? में औरों के समान न हु, मैं रिश्तों की अहमियत जानती हूं मैं बस हसने का दिखावा करती हूं, अंदर से इतनी टूटी हु की कभी जुड़ ना सकू, बस इसी दिखावे को लोग सच मानते हैं, बस इसी प्रकार अपना जीवन मैं जीती हूं। पता नहीं क्यों? कभी कभी बहुत रोने का जी चाहता है, तो कभी कुछ नया करने को मन करता है, बस इसी तरह से अलग बनी हु सबसे मैं, खुद को डटने के बाद मनाती भी हु। _दीप्ति तिवारी
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