शक्ति
हम एक ऐसे समाज में रहते हैं, जहां स्त्रियों को सिर्फ़ फेसबुक, व्हाट्स अप और इंस्टा पर ही सजाया जाता हैं। अगर इक लड़की अपने आप को सजाएं तो कहा जाता हैं, न जाने किसे दिखाने के लिए सज रही हैं? मां के शृंगार को कहा जाता हैं, मां ऐसे संज के रहती हैं तो बेटी कैसी होगी? और अगर वो शृंगार एक दादी या नानी कर ले, तो इस उम्र में सज रही हैं....! बात अजीब है, बलात्कार हो जाएं तो वो कपड़े अच्छे नहीं पहनती थी! वो तो ऐसी ही थी इसलिए ऐसा हो गया...! मुजरिम भी लड़की और उत्पीड़ता भी लड़की! कोर्ट की सुनवाई अगली तारीख पर ख़त्म हो जाती! गुनाहगार रिहाई में रहता, बिना समाज को इस बात का हिसाब दिए कि दोषी है वो! ससुराल में अपने हक के लिए लड़े,"तो मायके में संस्कार नहीं दिए हैं"! और अपने अधिकार के लिए ऊंची आवाज में बात कर दे किसी से तो "लिहाज़" नहीं है। मायके वालों के लिए पराई है और ससुराल वालों के लिए दूसरे घर से आई हैं! ये भी कोई अस्तित्व है? अस्तित्व बनाने के लिए ... तोड़ने होंगे बन्धन, अगर चमकना है कल्पना और सुनीता जैसा! सत्ता की बाज़ीगर बनने के लिए 'गूंगी गुड़ियां ' नहीं 'आयरन लेडी' बनना पड़ेगा। सिर्फ़ चुड़ी ही नहीं, बंदूक भी उठाना पड़ेगा। लोग क्या कहेंगे ये छोड़कर, सिर्फ़ दूसरों के लिए ही नहीं अपने लिए भी जीना पड़ेगा।।
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