चरैवेती
आओ चलें अब कब तक रुकें अब ये ठहराव ही तो विकार है चलते रहना ही तो प्रवाह है। ये छाँव ये ठंडक ये शिथिल शरीर ये नींद ये आराम ये मस्ती के गीत ये बंधन ये जकरन ये आलस मीत तन्द्रा तोड़ें जगें मुँह हाथ धो लें नीत । ये ठीक है कि लक्ष्य स्थिर है पर शिखर पार अनेकों शिखर हैं जीवन की शाम से पहले आलिंगन करें आओ अंतिम दिवस से पहले उसे अर्जित करें। अपने मन का मार्गदर्शन करें उसके हर बात का न अनुसरण करें साथ बैठे सब सुनें परामर्श करें विवेक से भी समन्वय आवश्य करें।
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