हीमाकत
हीमाकत ========================== हर बार धर्म ने अर्धपर जीत हासील की, फिर हर बार बेकार मे , ये हुज्जत क्यु। हर बार कपटी खेल से, तुम्हारा दिल नही भरता, जो बरोबर बार..... धोके से जीत की..., नाकाम कोसीस करते हो। नकाब ओढ के रख्खो क्यु, हमेशा ऊलझ जाते हो, बार बार जाताने की कोसीसमे, मार खाते हो। दिल नही भरा अभी भी, क्यु आच्छे भले को भी तुम्हारे साथ, फुसलाकर खीच लाते हो। समज लो ये बात धरम कभी भी , हार नही शकता, तुम कीतनी भी करलो, अधर्म की बात। हीमाकत मत करो ईतनीभी, जो वजुदही मीट जाये, तुम्हारा...... डरते है कही धरती का बॅंलेन्सही, न बीघड जाये, तुम्हारे कारण, तुम्हारे कारण । =======================
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