समंदर
किनारे की रेत पर बैठ कर, उसे देख पाना कहाँ मुमकिन है, वो जो अपनी गहराई में, हज़ारों राज़ छुपाए बैठा है। ऊपर से खामोश और नीले लिबास में लिपटा हुआ, अंदर ही अंदर, तूफानों से हाथ मिलाए बैठा है। उसकी लहरें आती हैं, ज़मीन को चूम कर लौट जाती हैं, जैसे कोई बिछड़ा हुआ, अपनों का हाल पूछने आता हो। कभी शोर में संगीत है, कभी सन्नाटे में चीख है, जैसे कोई मुसाफिर, सदियों की प्यास बुझाने आता हो। कितनी कश्तियाँ गुज़र गईं, कितने सूरज इसमें डूब गए, पर समंदर ने कभी अपनी वक़्त की रफ़्तार नहीं बदली। किनारों ने चाहा उसे बांधना अपनी सरहदों में, मगर उसने कभी अपनी लहरों की धार नहीं बदली। अगर समझना है इसे, तो डूबना होगा इसकी रूह में, कि समंदर सिर्फ पानी नहीं, एक ठहरा हुआ सब्र है। जहाँ ज़मीन खत्म होती है, वहीं से शुरू होती है इसकी दुनिया, ये खुदा की इबादत है, या फिर कुदरत का ही एक अबर है
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