मैं का उपचार
"मैं," जो निर्मल, शुद्ध था, अज्ञान ने घेर लिया, एक रोग जिसे मन कहते, जिसके लक्षण थे दुख, भय, द्वेष। इच्छाएँ, भय, और चिंता में घिरा, सांसारिक उपाय न लाए राहत; फिर मिला दिव्य ज्ञान का प्रकाश, जो हर लिया अंधकार का आवरण। अंत में, "मैं," शुद्ध, स्वतंत्र, शांति, आनंद में, अनंत। I hope this conveys the essence of the poem in Hindi beautifully!
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