कुदरत
हक़ीक़त कुछ नहीं लेकिन फसानों से है डर लगता नज़र में अश्क़ है फिर भी,दिखाने को है दिल हंसता ज़रा माजी में जाऊं तो हक़ीक़त गुनगुनाती है हवा आकर के कानों में,कई नग़्मे सुनाती है सहर से शाम तक यूं हीं हमारा वक्त है कटता नज़र में अश्क़ है फिर भी,दिखाने को है दिल हंसता कहीं सावन का वो जादू,कहीं पतझड़ की अंगड़ाई सुबह में खार पे शबनम, महकती शाम इतराई उन्हीं मौजों से आता आब,अभी भी जिक्र है करता नज़र में अश्क़ है फिर भी,दिखाने को है दिल हंसता ज़रा ठहरों ऐ पुरवा तुम हमे भी साथ चलना है तुम्हारी आसना से अब,खुदी में रंग भरना है तुम्हारे अब्र से लेकर,फ़ज़ा में हुस्न है भरना नज़र में अश्क़ है फिर भी,दिखाने को है दिल हंसता राजीव
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