मैं माथे पर बिंदी नहीं सजाती !
मैं माथे पर बिंदी नहीं सजाती ! मैं माथे पर बिंदी नहीं सजाती, ना सलवार–सूट में चुन्नी सँभाल शरमाती। राजकुमार के सपनों में खोकर मुस्कुराती— ऐसी ख़याली दुनिया मैं कभी नहीं बसाती। मैं माथे पर बिंदी नहीं सजाती… मैं रोज़–रोज़ बालों को संवार नहीं पाती, ना कानों तक झुमकों को आने की आज़ादी दे पाती। सौंदर्य–सिंगार की राहों पर इतराकर चलना मेरी फ़ितरत में अब तक नहीं आती। मैं माथे पर बिंदी नहीं सजाती… मैं रातों की नींद बातों में खोकर नहीं गँवाती, ना चाँद–सितारों जैसे वादों पर दिल बहलाती। ना जन्मों–जन्मों की कसमें खाकर किसी के नाम ज़िंदगी अपनी करवाती। मैं माथे पर बिंदी नहीं सजाती…
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