काश....
ऐ काश की हम एक हो जाते तेरे साये में स्वरते तुझको तुझसे ही खोखर खुद में मलते ऐ काश की हम एक हो जाते काश तुम मेरे पास होते तुम जब भी रोते रुमाल बनकर तुम्हारे आंसुओ को हम पोछते हवा बनकर तुझे प्यार से चूमते काश तुम मेरे पास होते जब भी तू बिखरा दिल ने तेरी रेहमत की आरज़ू की तू जब भी दूर गया दिल ने तुझे चाहते रहने की इबादत की हवाओं ने आज मुझे इशारा दिया लगा कुछ खोया हुआ था दिल सोया हुआ था मगर अब तुझे फ़िर से चाहने का इशारा इस दिल ने एक बार फ़िर दिया काफ़ी वक़्त गुज़र गया क्या तूने मेरे बिना रहना सीख लिया या तूने मुखौटा पहनना सीख लिया या वो प्यार ही सूरज की तरह ढल गया सूरज ढल कर उगता ज़रूर है तुझे चाहना मेरा फितूर है इसमें दिल का क्या कसूर है तुझसे चोट खाकर भी तुझे चाहता ज़रूर है काश हमारे पास ये दिल ही न होता न करते ये इबादत और न ही तू बनता आदत बस मैं ;मैं होती और तू ;तू होता काश तू मेरा होता काश तू सिर्फ मेरा होता.......
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