औरत थी... अब 'होना' बचा नहीं..
आधुनिकता की राह पर चलते-चलते हमने heels तो पहन लिए, पर वो पायल की खनक कहीं पीछे छूट गई। कॉर्पोरेट की मीटिंग में, सलीके से फाइलें तो संभाल लीं, पर दुआओं की थाली उलट गई कहीं। अब ना किसी के लिए मन से कुछ करना आता है, ना ही दिल से मुस्कुराना। जो देख कर हम बड़े हुए थे — वो औरत की नर्माई, उसकी ममता, वो हाथ का छू जाना और सुकून दे जाना — अब बस याद है, महसूस नहीं। हमने competition में compassion को खो दिया, सेवा में self-worth ढूंढी और समर्पण को कमज़ोरी समझ लिया। अब औरतें, औरतों जैसी कहाँ रहीं... गुस्सा है, तकरार है, जलन है, दूसरे की बात से चिढ़ और अपने मन की बात का शोर। हम औरतें अब मर्द बनने की होड़ में हैं— और शायद इस दौड़ में खुद को ही पीछे छोड़ आई हैं। तो सोचती हूँ... क्या यही थी 'वो' औरत? या वो कहीं अब भी चुप बैठी है... हमारे अंदर, इंतज़ार में।
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