मैं कौन हूं?
कुछ लोग पूछते हैं — इतना सुकून कहां से लाते हो? उन्हें क्या बताऊं… कि इस सुकून की कीमत कुछ अधूरी रातें और टूटी सांसें हैं। मैंने भी वक़्त से सीखा है — कि जो चुप रहता है, वो सबसे ज्यादा सुनता है। और जो खुद को समेटना जानता है, वो औरों को भी सम्हालना सीख जाता है। अब मैं हर मौसम को जीता हूं — पतझड़ को भी, बहार को भी… क्योंकि मुझे पता है, हर टूटना, किसी न किसी उगने की शुरुआत है। मैंने देखा है — पेड़ कैसे बिना शिकायत के हर तूफ़ान सहते हैं, और फिर भी छांव देना नहीं छोड़ते। शायद अब मैं भी वैसा ही कुछ बन गया हूं… कोई झील जैसा शांत, जिसमें कोई भी आकर अपना थकान उतार सके। मैं कुछ नहीं करता — बस थोड़ा ठहर जाता हूं, जब किसी की रूह बोलना चाहती है। और शायद इसी ठहराव में लोगों को वो सुनाई देता है जो वो खुद से भी छुपा रहे होते हैं। अब कोई पूछे मैं कौन हूं… तो कहूंगा — मैं वो खामोशी हूं जो सिर्फ सुनाई नहीं देती, महसूस होती है — जैसे धूप में पेड़ की छांव। — शब्दों की छांव: शिव समाय हांसदा:
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