😶🌫️
वो कली जो कभी खिली ही नहीं, अभी तो मध्यम हवाओं के झोंको को जाना है उसने, तेज तो चलती हैं अभी वह, आंधी तो चली नहीं। अभी खुद को देखा भी नहीं उसने नजरों से हमारी, जो उसके लिए लिखे मैने , उसको शायरियां मिली ही नहीं। अभी तो सूरज की किरणों से उसने बढ़ना सीखा है, गर्मियों में जो चलती है ,वो लू तो लगी नहीं। मुस्कुराता हुआ फूल नहीं,वह कली है जो खिली नहीं, अभी भौंरे नहीं बैठे उस पर,झपकी उसे मिली नहीं।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
