वह रात कितनी ख़ौफनाक रहीं होगी
वह रात कितनी खौफनाक रही होगी, वह दर्द से चिल्लाती हुई अपने आंसू का कतरा कतरा ना रोक पाई, पर उस हैवन के कान पर जैसे जू ना रेंग पाई। उसने यह तक ना सोचा कि ये भी किसी की बहन रही होगी, कि ये भी किसी के घर की शान रही होगी। मन में जाने कितने ही ख्याल आए होंगे कि काश में लड़का होती, तो शायद यह रूह को कौंधने वाली रात तो ना देखनी पड़ती। नीचता की इस हद तक गिर चुके हैं हम कि अब तो नरक भी सुनी सी पड़ गई है, दूर की कहा जाए जब अपने आस-पास ही सुरक्षित नहीं लगती है। हर सांस में दर्द, हर पल में पछतावा, अपने गुनाहों का दर्द, उसने अपने सर ही उठाया। वो 52 मिनट के तड़पन से ज्यादा मौत प्यारा लगा होगा, दर्द की रात से ज्यादा तो मौत का गोद ज्यारा लगा होगा। हार कर हताश होगई होगी बेचारी जब, दर्द का कतरा कतरा उसके ज़ेहन पर उतरा होगा तब। सोच कर भी शर्म आती है कि हमने इतना तड़पाया है कि स्त्रियां अपने स्त्रीत्व को छोड़ देना चाहती है, स्त्री होने पर खुद को ही कोस जाती है. आख़िर ऐसा क्या ही गुनाह कर दिया था उसने की नरक से भी बत्तर सज़ा मिली उसे , की खोया उसने सच्चाई का रास्ता, तो पछताप अपनी जान डेकर करना पड़ा उसे। उसकी हर सांस में दर्द का एहसास था पर आत्मा को जाने कभी सुकून ही ना मिला!! - सृष्टि
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