कलयुग का करिश्मा।
ढूंढें से मिलते नहीं, 'सोना' सच्चे लोग। इस सारे संसार को, लगा झूठ का रोग।। परनिंदा केवल सुने, इस कलयुग के कान। अच्छी बातों पर नहीं, पडता इनका ध्यान।। पर विकास को देखकर, मन होता वेचैन। सदा दूसरों की कमी, आज देखते नैन।। कलयुग में है बन गए, आज वही सिरमौर। जो कहतें हैं और कुछ, करते हैं कुछ और।। सबके मुखड़े पर मिला, 'सोना' आज नकाब। भला किसे अच्छा कहूँ, किसको कहूँ खराब।। ईर्ष्यामय यह जग हुआ, लोभ हुआ व्यापार l भाई-भाई का नहीं, अजब जगत व्यवहार।। झूठे इस संसार के, अजब-अजब हैं खेल। चोर और कानून का, हुआ भीतरी मेल।। धन अर्जन की चाह में, फैला कैसा रोग? शहर-गांव में बस रहे , खोए खोए लोग।। चार दूनी भी दो कहे, गणित बदलते आज। नीचे से ऊपर तलक, रुपयों का है राज।। स्वान,नाग,गिरगिट सदृश, कलयुग के इंसान। रुपया इनका धर्म है, रुपया ही ईमान।।
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