🌷
हज़ार तुफानो में भला जलती रही जो शाम वो, बाद- ए- शबा से उस को बुझाते जरूर है। बेबस से दिल पे करता है हजारो ही सितम, बन के मरहम ये चोट लगाता जरूर है । है अजीब सा ये रकीब जो अजीज है, दिल को मगर दोस्ती के लिबास मे रंजिशे निभाता जरूर है । भले तिनके का सहारा हो या की कश्ती हो, ला के साहिल पे हस्ती को डुबाता जरूर है । बेवजह नही रोता कोई इश्क़ मे जनाब, जिसे खुद से ज्यादा चाहो वो रुलाता जरूर है ।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
