तन्हाई, किताब और एक कप कॉफी
बाहर शोर है दुनिया का, और अंदर एक सन्नाटा है, आज फिर मैंने खुद को, खुद ही के साथ बांटा है। कमरे के एक कोने में, एक सुकून की बस्ती है, जहाँ मेरी रूह की , खुद से ही बनती है। एक हाथ में एक किताब, जिसमें महक नई सी आती है, वो कागज़ की खुशबू जैसे, रूह को छूकर जाती है। दूसरे हाथ में वो मग, जिससे धुआँ अभी निकलता है, मेरी तन्हाई का सूरज, अब इसी प्याली में ढलता है। शब्दों का सफर और कॉफी की महक, कॉफी का एक घूँट, उस अहसास को और गहरा बनाता है। कॉफी की वो सोंधी खुशबू, कागज़ की उस महक से मिलती है, जैसे बंजर ज़मीन पर, कोई नयी कली खिलती है। पन्ने पलटते जाते हैं, प्याली खाली होती रहती है, खामोशी मेरे कानों में, हज़ारों बातें कहती है। लोग जिसे 'अकेलापन' कह कर, अक्सर डर जाते हैं, हम उसी तन्हाई में, अपनी रूह को पाते हैं। ना किसी का इंतज़ार है, ना किसी से कोई गिला है, किताबों के इन पन्नों में, मुझे एक नया रास्ता मिला है। ना फोन की कोई घंटी, ना संदेशों का कोई जाल, बस ये किताब है हाथ में, और कॉफी का ख्याल। कॉफी की कड़वाहट अब, कड़वी नहीं लगती, ये तो वो आग है, जो दिल में बुझकर भी नहीं बुझती। ये तन्हाई अब दुश्मन नहीं, मेरी सबसे अच्छी यार है, किताब, कॉफी और मैं— बस इतना ही मेरा संसार है।
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