देव घनाक्षरी
देव घनाक्षरी(8,8,8,9) दिनकर ज्योहीं ढला,माखन चुराने चला , ग्वाल बाल, नंद लला,गोपिकाओं के घर घर; सभी बढ़े दबे पांव, निकल पड़े ये गांव, उल्टा नहीं पड़े दांव , मन ही मन डर डर। बन चतुर सयान, घुसा ये एक मकान सभी थे यूँ सावधान ,आवाज़ न हो खर खर; पाने को चाहा मुकाम,गिरे तभी यूँ धड़ाम, पकड़ में आया श्याम, कांपने लगा थर थर। नरेंद्र सिंह 26.04.2024
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
