काश ऐसा होता
काश ऐसा होता कि तू मेरे लिए आए मगर मैं न चाहूं तुझे। काश ऐसा होता कि तू मेरे लिए आए मगर मैं न चाहूं तुझे। देखना चाहूं तुझे भी उस दौर से, जहां कभी मैं खोया था। रोते-रोते मेरे पास आए, और मैं फिर न अपनाऊं तुझे। दर-ब-दर फिरता था यहां-वहां, तेरे एक दीदार में। अब आए हो तुम इस तरह, कि हर कोई है मेरे इंतजार में। अपने अंदर के शोर को चुप कर, सोया हूं मैं आज यूं, कि जागूं न मैं फिर कभी। और तुम आए हो... क्या अश्क हैं ये बेकार में। काश ऐसा होता, कि हम कभी न टकराए होते। दो पल की मुलाक़ात में मुस्कुराए न होते। तुम्हारे किए वादों पर इतराए न होते। तुम्हें पूरा आलम मान, कायनात को भुलाए न होते। काश ऐसा होता, तुम इस बार आए न होते। अगर आए भी होते, तो मुझे अपनाए न होते।
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