मै और मेरा साया
मै चलने लगा तो वो कहने लगा कहा जा रहे हो मैं आता हूं तू रुक बोला साथ चलूंगा मैंने किया मना तो मुझे रोक लिया मेरे बिना तू नहीं कैसे जाओगे जाके दिखा मैं चलूं कभी आगे मेरे कभी पीछे मेरे कभी अगल तो कभी बगल और कभी कभी तो सर पर मेरे कभी तो कदमों मे भी मेरे मेरे सुख मे चला मेरे दुःख में चला मेरे रुकने पर रुका वो,मेरे झुकने पर झुका वो बैठने पर बैठा , लेटने पर लेटा वो मैं रोया तो वो रोया कशमकश थी जिंदगी की पर मैं हंसा तो ही हंसा वो बहुत बार पैरो में रहा वो खुद धूप में तपता रहा मुझे छाया देता रहा वो जब बिछड़ने का आया वक्त तो भी हो गया वो सख़्त मै बोलूं चले तो मेरे पहले लेट गया और तो और चिता पर भी मेरे से पहले सो गया मैंने एक अनोखा मित्र पाया था वो कोई और नहीं मेरा खुद का साया था! धीरज शेखावत
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