समय समय की बात
आ गए हाथ में पैसे तो, परवरदिगार बन गया; मानिंद बनने लगा मानो, इज्जतदार बन गया। स्वातीत को झांकना ही,छोड़ दिया वो अब तो, बड़े लोगों के साथ,बैठने का हकदार बन गया। छुआ था ये ऊंचाईयां,जिसके कंधे पर चढ़कर; अब उसे देखने लगा यूँ,घृणा भाव से उचककर, कोसता है अब उसे ही,ठोककर निज छाती को, अब उसकी चाहत कि दर पर,वे आते रहे चलकर। नरेंद्र सिंह 24.02.2024
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