सच्ची खोज
पत्थर पूजे शिव मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़, जिसकी चोटी छू सके, अंबर के उस पार। अगर मूर्तियाँ तारतीं, इस जग का मंझधार, तो पर्वत की गोद में, मिलता मोक्ष अपार। मिट्टी को आकार दे, हमने देव बनाये , फूल चढ़ाए, धूप दी, पर मन न साफ कर पाये। बाहर के उस शोर में, सोया अंतर्ज्ञान, पत्थर में तो जान नहीं, पर खो बैठा इंसान। लिये माला हाथ में, फिरे जगत के द्वार, मन का मैल न धुल सका, व्यर्थ है सब श्रृंगार। घंटी की उस गूँज में, दबी हृदय की पीर, भीतर शिव को ढूँढ ले, बदल जाएगी तकदीर। शिव तो बैठे मौन में, शून्य के उस पार, न वो माँगते आरती, न स्वर्ण का हार। परोपकार ही भक्ति है, सेवा ही है जाप, दुखी हृदय को शीतलता, देना ही पुण्य-प्रताप। कंकड़-कंकड़ जोड़कर, बनाया भव्य मकान, पर भीतर बैठा देवता, अब भी है अनजान। अगर ईंट और पत्थर में, मिलता सच का मेल, तो सारा जग ही जीत लेता, यह भक्ति का खेल।
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