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रोज़ रोज़ बात हो, और लगाव न हो, मतलब खंजर चले और घाव न हो। वचन पिरोए जाएँ, पर उस में शामिल भाव न हों जैसे कागज़ की नाव हो , पर डूबना जिसकी तकदीर न हो। जैसे सफर तो कटता हो , पर उस की कोई मंजिल न हो सुबह तो हो जिसकी , पर शाम की कोई कहानी न हो l एक धागा खिंचा रहे , पर उस में कोई गांठ न हो दिल के दरवाज़े पर आकर , अब किसी की दस्तक न हो। वो हँसी जो होंठों पर तो है , पर उसका अक्स आँखों मैं न हो रिश्ते की ज़मीन पर , अब मोहब्बत का बीज न हो l दूरी का एहसास तो हो , पर नज़दीकी की कोई ख्वाहिश न है l पानी बरसता रहे , पर मिट्टी अब भीगी न हो l आदत सी बन जाए कोई , पर अब इश्क़ न हो जैसे केवल साँस चलती जाए, पर जिस्म में रूह न हो l जैसे जीती बाज़ी को, जानबूझकर हार जाना हो।
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