इच्छाएँ
क्या तुमने कभी सोचा है, जिस रोज अचानक हमारी सभी , अधूरी पड़ी इच्छाएँ पूरी हो जायेंगी, उसके बाद क्या होगा? क्या फिर जीते रहने में वही स्वाद रहेगा? क्या फिर कुछ पा लेना ही, अंत कहलाएगा? मुझे लगता है, हमारी कुछ इच्छाएँ इसीलिए भी अधूरी रहती है, ताकि हम जीने की इच्छा को मरते हुए न देख सकें।
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