इश्क़ की सात सीढ़ियाँ (ग़ज़ल)
पहली सीढ़ी — दिलकशी की, जब नज़रें टकराती हैं, अजनबी से चेहरों में भी, अपनी सी कोई बात नज़र आती है। दूसरी — उन्स का आलम, जब दिल बेवजह धड़कता है, उसकी हर बात में, जैसे खुदा का पैग़ाम चमकता है। तीसरी — मोहब्बत की आग, जब रूह रूह से मिलने को तरसती है, हर पल उसका नाम लबों पर, हर दुआ उसी के वास्ते बसती है। फिर आती है — अकीदत की मंज़िल, जब इश्क़ पर भरोसा होता है, उसकी हर बात, हर ख़ामोशी, जैसे क़सम से सच्चा किस्सा होता है। प्रेम है विश्वास की ज्योति, जो अंधेरों को भी रौशन कर देती है, ये पूजा है रूह की, जो हर सांस को भी पवित्र कर देती है। प्रेम में व्यक्ति खुद को खो देता है, साथी में खुदा को पा लेता है, हर चाहत, हर अभिलाषा, बस उसके नाम में समा लेता है। छठी — इबादत, जब महबूब में रब दिखता है, उसकी याद में सजदा होता है, हर सांस में नाम उसका सिसकता है। सातवीं — जुनून की हद, जब होश खो बैठता है दिल, और फिर आख़िरी सीढ़ी — मौत, अगर इश्क़ मुकम्मल हो, तो सुकून की चादर ओढ़ चल देता है, वरना अधूरी मोहब्बत में, जान भी सिसक कर खुदकुशी कर लेती है। "हर लफ़्ज़ में छुपी है 'उत्कर्ष' की सदा, इश्क़ की इस दास्तां का वो ही तो है दास्तां-निगार।"
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