जिंदगी
मैंने सोचा सोचा और बहुत सोचा घर तो बना लिया मैंने पर छोड़ा हीं नही झरोखा अब हवा कहां से आयेगी किरदार कहां दिखेंगे जो मेरी कहानी को बदलेंगे कैसे नजरे मिलेंगी कैसे बस आंखों से हां कह देंगे इतने में एक आवाज आई शायद मुझे बनाने वाला कुछ कह रहा था बड़ी उदासी थी उसके आवाज में कुछ ऐसा कहा उसने की यार ढाला था मैने तुझे अमूल्य अमृत के मदहोशी मे और तू मखौल उड़वा रहा अपना इस तुक्ष शराब की आगोशी में अरे पागल ए तेरी कहानी है तोड़ मडोड़ पन्नो को चाहे पुरी कहानी फाड़ फेक दे गिरा दीवारों को बना झरोखे जब मैने दिया अख्तियार तो कौन तुझे है नया लिखने से रोक रखा इससे पहले मैं कुछ बोल पाता मेरी आंखें खुल गई फिर कुछ अजीब हुआ और सारी ढलती शामें आते सुबह में घुल गई
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