एक पंछी
एक शाम छत पर खुद से बातें करते हुए यूं ही शांत बैठा मुझे एक पंछी मिला। कुछ अलग सी खूबसूरती थी उसकी आकृति में, कुछ अलग सी खुशी थी उसकी मंद मुस्कुराहट में। कुछ कदम उसकी ओर बढ़कर पूछा मैने उससे, भला क्या है तुममें ऐसा जो तुम्हारी छठा को चांद के किनारे बसने वाले किसी तारे सा, नदी के किनारे बने किसी मंदिर सा अद्भुत बनाता है? मुस्कराया वो ज़रा सा मुझे देखकर, और मुस्कुराकर मुझसे बिन कुछ कहे बोला, मैं तो बस उस आसमान को छूने को आतुर हूं, उसमें छिपे चांद से बातें करने को इच्छुक हूं। ये उम्मीद कि शायद एक दिन वो आसमान मुझे अपना कहकर अपने हृदय से लगा ले, और वो चांद अपना ही एक हिस्सा समझकर अपने आंचल में मुझे यूं ही छुपा ले। ये उम्मीद ही मुझे मेरी खूबसूरती देती है ये उम्मीद ही मुझे वो बनाती है जो मैं हूं। बस इतना कहकर उड़ने के जतन करने लगा वो, मानो की इसी पल वो उस नभ को पा लेगा। रोका मैने उसे ज़रा प्यार से और पूछा कि क्या मुझे दोबारा कभी मिलोगे तुम? फिर से मुस्कुराया वो और बोला, अगर मिलने की वाकई इच्छा हो, तो अपने मन में ढूंढ लेना।
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