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ना बिकती है कहीं ख़ुशी, ना कहीं ग़म बिकता है, लोग समझते हैं शायद, हर ज़ख्म का मरहम बिकता है। इंसान — ख्वाहिशों से लबरेज़ एक ज़िद्दी परिंदा है, उम्मीदें ही उसे घायल करती हैं, उन्हीं पर वो ज़िंदा है। मिट्टी से यारी रखता है, दिल में दिलदारी रखता है, बातों से ना हो चोट किसी को, इतनी समझदारी रखता है। सबसे अलग पहचान बनाए, ऐसी भी कलाकारी रखता है, इंसान दिल में छुपाकर, एक बड़ी खुद्दारी रखता है।
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