जिंदगी
अनजान भीड़ में लापता है जिंदगी, मानो खुद ही खुद से जुदा है जिंदगी.. अनजाने लोग अनजानी राह, ना बिछड़ने का गम ना मिलने की चाह.. कभी लोकल ट्रेनों में धक्के, तो कभी स्टेशनों का सहारा.. अनजान राहों में भला कौन होगा हमारा.. वो भी समय था जब आंख के तारे थे हम, माँ के लाडले तो पिता के प्यारे थे हम.. अब समय कहां की माँ का प्यार मिले, मुझे वो वही पुराना खुशियों का संसार मिले.. जहां आते मिलता था सुकून भरा विस्तर का सहारा, अब तो विस्तर के नाम पर है रेलवे का किनारा.. खैर अफसोस नहीं मैं खुद ही खुद को समझाता हूं, पिता कहते हैं लड़का हो मैं उसका फर्ज निभाता हूं.. कब मिलेगी मंजिल ये सोच कभी घबराता हूं, माँ का है आशीर्वाद ये सोच - सोच मुस्काता हूं.. कहा है माँ ने उन्हें है उम्मीद बड़ा मैं कुछ कर दिखलाऊंगा, गर्व से कहेगी माँ मेरी मै बेटे का फर्ज निभाऊंगा.. माँ पिता के आशीर्वाद ले करूंगा उनकी वंदगी, फिलहाल तो अनजान भीड़ मे लापता है जिंदगी..
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
