कलयुग है
कैसे-कैसे लोग धरा पर, एक से बढ़कर एक; जिस थाली में खाता बंदा,उसी में करता छेद। मातु-पिता ही पाल-पोसकर,पूत को करे जवान; बुढ़ापे में जब हो जरूरत,पूत बनता अनजान। जन्म से लेकर जवानी तक,माँ-पिता करते प्यार; पत्नी जब घर आ जाती है,माँ-पिता लगते भार। मातु-पिता को उपचार नहीं,उनको लगेजब रोग; उनकी मौत पर तब देखिए,जमावे छप्पन भोग। जिंदगी भर माँ चिंताग्रस्त,बेटा जिए सुख चैन; पुत्र, उस माता की मौत पर, बजाबे बाजा बैंड। नरेंद्र सिंह 27.03.2024
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