बेटी
मैं भारत कि बेटी हूं, जो कहती हूं वो आज सुनो जो दबी हुई थी सदियों से, मेरे मन की आवाज सुनो क्यों साथ बंदिशे लाती हूं... जब मै दुनिया में आती हू हर नियम से, हर बंधन से... क्यों मैं ही बांधी जाती हूं क्यों पिता-पति के साये में... मै सिमटी सी रह जाती हूं क्यों समझौते हालातों से.... करते करते थक जाती हूं धीरज की सीमा टूट चुकी, लो हुआ नया आगाज सुनो जो दबी हुई थी सदियों से , मेरे मन की आवाज सुनो जो खुद नारी का रूप धरे..वो नारी से कतराती है बेटी होने की खुशियां क्यों..तानों में बाँटी जाती है सपने बुनती मेरी अँखियाँ..सहसा, गीली पड़ जाती है जब खुशियां मेरी दबती हैं...इज़्ज़त घर की बढ़ जाती है मेरे टूटे कुछ ख्वाबों से..है बढ़ी किसी की साख सुनो जो दबी हुई थी सदियों से..मेरे मन की आवाज़ सुनो मेरे दम से है दुनिया, फिर ... क्यों कोख मेरी अनमोल नहीं बेटी होने पर बजते क्यों... फिर बेटों वाले ढ़ोल नहीं क्या मूछों के इस जमघट में... मेरी चोटी का मोल नहीं या रावण की इस लंका में... सुनते सीता के बोल नहीं हर तरफ उठ रही धूमिल सी, आंधी की आहट आज सुनो जो दबी हुई थी सदियों से मेरे मन की आवाज सुनो मैं कृष्ण सखी वो राधा हूं... जो प्रेम शब्द का सार बनी मैं कौशल्या-यशोदा बनकर... हर युग ममता की धार बनी मैं योद्धा लक्ष्मी बाई हूं... जो दो धारी तलवार बनी मैं वंश वाहिनी धआ
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