ममता मोह
छोड़कर बिछड़ गए सब अपने अपने रास्ते तूफान के पहले झलक पर, बस एक वही खड़ी रही डाटा हुआ पर्वत बनकर मेरे मुसीबत के हर मोड़ पर। कभी गिरकर संभालूं तो चोट पर मरहम का सहारा बनी, तो कभी आसमानों की ऊंचाइयों में उड़ने का मेरी सबसे बड़ी विनम्र प्रेरक रही। दासता चाहे जो भी हो जब जब पीछे मुड़कर देखा मां का हाथ जरूर अपने सर पर पाया।
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