"चाहत सुकून की"
मुश्किल रास्तों पर चलकर "करना है,डरना नहीं" ख़ुद को ये समझाना चाहती हूं बस अब बहुत हुआ मैं जैसी भी हूं वैसी ही ख़ुद को ये अपनाना चाहती हूं ज़रूरी हूं सबके लिए तोड़ देना अब तो मैं ख़ुद का ही ये भ्रम चाहती हूं चेहरे पर अब ख़ुद के ही मुस्कान थोड़ी ज़्यादा, ग़म थोड़ा कम चाहती हूं मैं शान्ति में छिपा सुकून चाहती हूं एक बार फिर वहीं खोया अपना जुनून चाहती हूं ! पुजा लोहार (मेरी डायरी से) प्रतापगढ़, राजस्थान
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