क्रमशः
इहें कमा के हम्म बना देबऊ, तोर झुमका झूलनी, कलह घर में नैय करिहँ तनिको तू, नै बनिहँ मुँह फूलनी। निके सुखे सभे हिल मिल के रहबे, तू रहिहs सुघर बेस। मलकिनीया गे हम्म नै जइबऊ, कमाए ला परदेस।। मलकिनीया गे हम्म नै जइबऊ, कमाए ला परदेस।। नरेन्द्र सिंह, अतरी, गया 04.01.2025
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
