पक्षपात
क्यों रे ! तू क्यों आहत करता है अपनों को ऐसे तो तू खुद घायल हो जाएगा किसी का उड़ा कर रातों की नींद बोल ! क्या तू भी चैन से सो पाएगा। आंखों के आंसु का कारण बन क्या तु भी कभी हंस रह पाएगा अपनों के मन में लाकर तूफ़ाँ तुम शांति कभी तू अपने में ढूंढ पाएगा। पता है मुझे की दुखी तु भी है मन इसका अवसर भी तुम्हीं लाए हो अब पछतावे से क्या होगा भला जाने अनजाने ठेस लगा आए हो। अपना कहा है तो निभाना होगा कैसे भी दिल नहीं दुखाना होगा डोर होती है बहुत नाजुक मनवा इसे टूटने से हमेशा बचाना होगा। वचन का पालन ही अब सर्वोपरि है इसके लिए जी जान लगाना होगा अब तो प्रयासों को और संगठित कर नया विश्वास व नई राह बनाना होगा।
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