एक उदास शाम विषय: शिकवा
अजीब मंजर है उसकी बेरुखी का भी, जख्म भी वही देता है और मसीहाई की उम्मीद भी। वो तो तारीकियों से भी समझौता कर लेते, पर उसने तो छीन लिया जर्रा-जर्रा नूर का भी। लिखा था जो मुकद्दर में, वो मयस्सर नहीं, जो मिला है उससे अब उन्हें कोई मल़ाल नहीं। बस एक खल़िश है कि पुकारा था उसे शिद्दत से, मगर उसके आस्तां से कोई जवाब मिला नहीं। वो पत्थर की लकीरें बदल सकता था, गिरती हुई साख संभाल सकता था। पर उसने तमाशा देखा उनकी बेकसी का, जैसे उसे शौक हो उस रूह की कारिगरी का। अब न दुआ में तासीर है, न सज़दों में सुकून, बस एक खला है और यादों का जुनून। अदालत उसकी, शाहिद भी वो, और मुंसिफ भी वही, बेगुनाह होकर भी उनका हार जाना, शायद यही है उसकी रज़ा सही।
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