मैं बेकसूर था ....
कि तेरी मोहब्बत का सिला, मुझे ये मिलेगा मालूम न था , खुद से भी इतना रूठ जाऊंगा, मालूम न था ... मोहब्बत को खूबसूरत बताने , वालो की बातों में आ गया , इतना झंझोर दिया दिल को , की हाथों में आ गया , मुझे हर झूठे वादे पर ऐतबार था , हर पल तेरे नाम करने को , बेकरार था , बेहतर होता कि , ये मुलाकात ही ना होती , क्योंकि उन आंखों में , हर पल तेरा ही इंतजार था , दुनियादारी में बांध दिया , मिलता कैसे मैं , मजबूर था , कुछ गुनाहों को साबित नहीं कर पाया , लेकिन , मैं बेकसूर था ...
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