भुचाल
भुचाल ====================== बहोत पाला है अभी तक गुस्सेको, बस अब भुचाल आना बाकि, बहणा तो तय है............, ऊन गुणहगारोको......,. जो फरीस्ते बणे फिरते है, समाज मे, लुटने!?अनमोल ईन्सांनियतके, सामाजिक विचारोको. जो दरिंद्दे झडप डालते है, औरत के मासुम ईरादोपर, कुचलकर रख देते है, ऊन के आरमा........, आपणही ईन्सांनियतकी झुटी धाक जमाकर. कसम है अब मुझे, ऊस पालेहुये गुस्से और.., आपने माॅबापकि. हलक मे हात दाल, खिचलु ईनकि सारी द़रिंदगी , एक झटके मे जात ईन की, मुडदा बना के....., !. बहा दु आनेवाले भुचाल मे......., बहा दु आनेवाले भुचाल मे. ==================
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