मुसाफिर राह बनाते है ।।
मन में कई सवाल लिए , उलझनों में बंधे किरदार लिए , मुखौटे हज़ार लगा कर एक , मुसाफिर राह बनाता है । सामने कंकर हो या सर्प , किंचित भयभीत ना मन होता तब, जो धैर्यवान हो जाता है , संभलकर पांव बढ़ाता है , अगर पांव नंगे है तो क्या , हर कदम एक छाप छोड़ जाता है , जो प्रश्नों में डूबकर आता है , उत्तर की खोज को जाता है , जो " हारा " घोषित कहलाता है , पर "हार जाना" सेह ना पता है, हर कदम पर जोश जगता है , एक मुसाफिर राह बनाता है ।। जब पीछे मुरा तो कोई नहीं , जो बगल देखा तो कोई नहीं , जब हंसना था तो कोई नहीं , जब हंसाना था तो कोई नहीं , वो खुद ही खुद को हंसाता है , अपनी नाव खुद ही पार लगाता है , हर लम्हे , ओर हर मौसम में , ना मन कभी डगमगाता है, वो राही चलता जाता है , वो मुस्काफिर राह बनाता है ।। जो सूरज की तपती तेज हो , या चन्द्र की शीतलता , चाहे रास्ता अंजान हो , ओर ना ही हो मंजिल का पता , वे रास्ता स्वयं निकालते हे , यही संकल्प बनाते है ।।
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