इशक द रोग
चढ़या हमके इशक द रोग उस बिन हिया ना लागा जी बिना देखे मोहे उसकी सूरतिया तनमन कहीं न लागा जी प्रियतम मिलन न हम है तरसी स्वामी मिलन न मोहे आस हम है तरसी उस मिलन की जिसमें जीवन सादा जी ऊह है हमरा प्रिय साहित्य जिसके इशक में डूबे जी काहे की, ऊहे दिलाए मोहे स्वाभिमान ऊहे दिलाए मोहे श्रेष्ठता ऊहे दे हमके ज्ञान सरोवर ऊहे दे हमके भाव सलोना ऊहे दिखलाए यथार्थ दर्शन ऊहे दिखलाए मार्क्स दर्शन ऊहे बनाए मोहे,प्रवणसम्पूर्ण इंसान। बस,ऐंही व्याधि द लगा हमके रोग। जिसमें सुख संतोष बहुत जिसकी दुर्व्यसन में हम है दीवानी जिसका मर्म न जाने कोय यही तो हमरे जीवन की आस साहित्य जिन्दगी भर रहे हमरे पास।
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