जुगबे बिगड़ गेल
बुढ़वा-बुढ़िया रील बनाबे, संसकार में लगल पलीता। नाचे-गाबे गाना भौंडा, पढ़य नैय ऊ मानस गीता।। बड़का असर पड़ल पीढ़ी पर, बिगड़लय बऊआ-मंईयाँ। किरतन-भजन नैय अब होबय, होबे सगर कमर लचकइयाँ।। संसकार दिखइ नै कहूँ पर, करय सभे अब बड़ मनमानी। हया-लजा पी गेल घोर के, कलजुग के ई भेल कहानी।। बेटा-बेटी रील बनाबय, दे हे माय-बाप टिटकारी। बुढ़वा-बुढ़िया थिरकय नाचय, पोता-पोती दे सिसकारी।। सामाजिक मंच गमक गेल हे, गंदा रील के मारामारी। कउन केतना नंगे रह सकत, सभे में होड़ मचल हे भारी।। नरेंद्र सिंह, अतरी, गया 26.05.2025
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
