शिकस्त - ए - मोहब्बत
तकरीबन आधा दर्जन वर्ष गुज़ार चुके थे, कहीं मेरी सहनशीलता ने ही तो इश्किया जान नहीं निकल ली होगी? घर नया बसा ही लिया था, नए मुज्जमत तैयार कर लिए थे, कहीं मेरी मोहब्बत के कारण ही तो तुमने हार नहीं मान ली होगी ? दरकिनार किया गया था, हर बार ठुकराके, मोहब्बत ए फ़ारस ही तो कहीं ठान तो नहीं ली होगी? कुछ यूं तो छोड़ देते तबाह करके, हमउम्र हमे राज बना के, तहरीके हकीक़त ही तो कहीं तुमने जान नहीं ली होगी !! वज़ाहत कहीं देख ली होती तो ज़लालत खुद करवा लेते खुशी - खुशी, जवानी तुमने कहीं ढाल तो नहीं ली होगी? एकतरफा मोहब्बत क्या ख़ाक बोलूं, अब मुखातिबियां सीने तुमने डाल तो नहीं ली होगी ? मुतकब्बिर होता तो शायद यहां तक, मोहब्बत ए शायरी तो कभी कहीं सवाल नहीं होगी? जवाब में लड़ूं अपने आबो - आप से तकरीबन आधी जिंदगी तो न कहीं गुज़ार ली होगी !!
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
