श्री प्रेमानंद महाराज जी
दिखावट भरी इस दुनिया में जो सत्य सनातन राह है , जिनके मुख की मुस्कुराहट ही भटकते मन की चाह है जो है गुरु ओर मित्र का मिश्रण , संग में राधा नाम धनी स्वयं को हरि दस कहलवाते , दास ही है या स्वयं हरि ।। पीताम्बर सजता तन पर जिनके , ओर राधा नाम एक शोर है , जिनकी वाणी स्वयं है गीता , ओर भजन के छोड़ है , मुख ओर जिनकी लालिमा सजती , ओर जाता जिनकी शिव सी, मस्तक पर सुशोभित चंदन , ओर आंखों में इतिहास छुपी । मन यह जब उदास पद जाता , तो स्वयं गर्जन बन जाते हो "हारना नहीं टूटना नहीं " कहकर एक नया जोश जगवती हो अर्जुन रूपी इस मन के स्वयं सारथी यूं बन जाते हो , ओर भटकते इस मन को उसका निवास दे जाते हो । तो मुझ पर भी कृपा कर दो आपके पर आना चाहता हु, आपको अपने इन आंखों से एक बार देखना चाहता हू , वृन्दावन के कृष्ण कुंज के दीवारों से थी निवेदन है , चौखट पर टेक सकू यह सर , चुकी वहां स्वयं हरि के दर्शन है ।।
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