"बूढ़ा गुलाब"
कभी था खिला, कभी था हँसा, तेरे हाथों में मुस्कुराया था, आज मुरझाकर चुप सा बैठा, बस यादों में लिपट आया था। हवा से झूमा, बहारों में नाचा, तेरी हथेली की छुअन में सधा, अब झड़ गई हैं पंखुड़ियाँ सारी, बस एक सुगंध ही बाकी रहा। शायद तूने संभाल के रखा, किसी पुराने अहसास सा, जो अब भी धड़कता रहता है, तेरी नजरों के आसपास सा। गुलाब बूढ़ा हो गया सही, पर इश्क़ तो आज भी जवान है, पंखुड़ियाँ चाहे बिखर गई हों, पर उसकी रूह तेरे दरमियान है।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
